US टैरिफ नीति में बड़ा बदलाव संभव? 52 साल पुराने कानून की समीक्षा शुरू
| आमेरिका भारत में फिर टैरिफ लगाएगा - फोटो |
अमेरिका की व्यापार नीति एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े नियमों और नीतियों की समीक्षा शुरु की गई है। इस समीक्षा का सबसे अहम पहलू यह है कि करीब 52 साल पुराने अमेरिकी व्यापार कानून को फिर से परखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समीक्षा के बाद बदलाव किए जाते हैं तो अमेरिका की टैरिफ नीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। टैरिफ यानी आयात शुल्क का इस्तेमाल अक्सर किसी देश के घरेलू उद्योगों की रक्षा करने और विदेशी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के लिए किया जाता है। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसीलिए उसकी टैरिफ नीति में किसी भी तरह का बदलाव वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
क्या है 52 साल पुराना कानून?
जिस कानून की समीक्षा की जा रही है, वह है Trade Act of 1974 यह कानून 1974 में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिका के आर्थिक हितों की रक्षा करना था। इस कानून के तहत अमेरिका को यह अधिकार मिलता है कि यदि कोई देश अमेरिकी कंपनियों या उत्पादों के साथ अनुचित व्यापारिक ब्यवहार करता है , तो अमेरिका उस देश के खिलाफ टैरिफ लगा सकता है या अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लागू कर सकता है। इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान Section 301 माना जाता है। इसी प्रावधान के जरिए अमेरिका विदेशी देशों की व्यापारिक नितियों की जांच करता है और जरूरत पड़ने पर उनके खिलाफ कदम उठाता है।
Section 301 क्या है और यह कैसे काम करता है?
Section 301अमेरिकी ब्यापार नीति का एक शक्तिशाली उपकरण माना जाता है। इसके तहत अमेरिकी सरकार यह जांच करती है कि कोई विदेशी देश ऐसी नीतियां तो नहीं अपना रहा जो अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचाती हो। यदि जांच में यह पाया जाता है कि किसी देश की नीतियां भेदभावपूर्ण, अनुचित या अमेरिकी उद्योगों के लिए नुकसानदेह है तो अमेरिका उस देश के उत्पादों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगा सकता है। इस प्रक्रिया में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यानी ऑफिस ऑफ दा यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव अहम भूमिका निभाता है। यही एजेंसी जांच शुरु करती है और बाद में सरकार को कार्रवाई की सिफारिश करती है।
नई जांच क्यों शुरू की गई?
हाल के समय में अमेरिका में टैरिफ नीति को लेकर कई कानूनी और राजनीतिक बहसें सामने आई है। कुछ उद्योग समूहों और कंपनियों ने अदालत में यह दावा किया कि सरकार ने कुछ मामलों में टैरिफ लगाने के लिए गलत कानूनी आधार का इस्तेमाल किया। इन विवादों के कारण प्रशासन को अपनी व्यापार निति की समीक्षा करनी पड़ी। अब सरकार ने 1974 के कानून के तहत नई जांच शुरू की है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन देशों की नीतियां अमेरिकी व्यापार के लिए चुनौती बन रही है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका कई प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की नीतियों की जांच कर रहा है। इन देशों पर आरोप है कि वे अपने उद्योगों को भारी सब्सिडी देते हैं या ऐसे नियम लागू करते हैं जिससे अमेरिकी कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है।
टैरिफ नीति का इतिहास
अमेरिका लंबे समय से टैरिफ का इस्तेमाल अपनी आर्थिक नीति के हिस्से के रूप में करता रहा है। 20वीं सदी में कई बार अमेरिकी सरकार ने घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए आयात शुल्क बढ़ाए। हालांकि बाद में वैश्वीकरण के दौर में कई देशों ने मुक्त व्यापार समझौतो को बढ़ावा दिया और टैरिफ को कम करने की कोशिश की। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में फिर से संरक्षणवादी नीतियों की चर्चा बढ़ गई है। खासकर डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यालय के दौरान अमेरिका ने कई देशों के खिलाफ भारी टैरिफ लगाए थे। उस समय अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव भी बढ़ गया था, जिसे कई विशेषज्ञों ने ट्रेड वॉर की स्थिति बताया था।
वैश्विक व्यापार पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि इस जांच के बाद अमेरिका नए टैरिफ लागू करता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर पड़ सकता है। अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में से एक है और कई देशों के लिए प्रमुख बाजार भी है। टैरिफ बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले से ही लागत बढ़ने और व्यापारिक अनिश्चितता को लेकर चिंतित हैं। इसके अलावा कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका बड़े पैमाने पर टैरिफ लागू करता है तो अन्य देश भी जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है।
अमेरिकी उद्योगों को क्या फायदा हो सकता है?
अमेरिका के कई औद्योगिक संगठनों ने इन कदम का समर्थन किया है। उनका कहना है कि विदेशी कंपनियों को मिलने वाली सरकारी सब्सिडी और सस्ते उत्पादों के कारण अमेरिकी उद्योगों को नुकसान उठाना पड़ता है। यदि नए टैरिफ लागू होते हैं तो इससे अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को राहत मिल सकती है। खासकर स्टील, ऑटोमोबाइल और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। कई उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि टैरिफ के जरिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है असर
हालांकि टैरिफ का एक दूसरा पहलू भी है। जब आयातित उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है। तो कंपनियां अक्सर अपनी लागत उपभोक्ताओं पर डाल देती है। इसका मतलब यह है कि विदेशी समान महंगा हो सकता है और उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लंबे समय तक टैरिफ बढ़ने से बाजार में प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है। जिससे कीमतों पर असर पड़ सकता है।
कानूनी और राजनीतिक बहस
टैरिफ नीति को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने कानूनों का इस्तेमाल आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में सावधानी से किया जाना चाहिए। दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि यह कदम अमेरिकी उद्योगों और रोजगार की सुरक्षा के लिए जरूरी है। सरकार का कहना है कि कई देशों की व्यापार नीतियां अमेरिकी कंपनियों के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को मुश्किल बना देती है। इसीलिए ऐसी नीतियों की जांच करना और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करना जरूरी है।
आगे क्या हो सकता है?
Section 301 के तहत होने वाली जांच आमतौर पर कई महीनों तक चलती है।इस दौरान विशेषज्ञों की राय ली जाती है, सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित की जाती है और संबंधित देशों के साथ बातचीत भी की जाती है। जांच पूरी होने के बाद अमेरिकी सरकार यह तय करती है कि टैरिफ लगाएं जाएं या अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लागू किए जाएं। यदि नए टैरिफ लागू होते हैं तो वे कई वर्षों तक प्रभावी रह सकते हैं और समय समय पर उनकी समीक्षा भी की जा सकती है।
निष्कर्ष
अमेरिका द्वारा 52 साल पुराने Trade Act of 1974की समीक्षा शुरू करना वैश्विक व्यापार नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया के नतीजे आने वाले महीनों में स्पष्ट होगें। अगर टैरिफ नीति में बड़े बदलाव होते हैं, तो इसका असर न केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर भी दिखाई देगा। दुनिया भर की सरकारें, उद्योग और निवेशक इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिका अपनी बाजार नीति को किस दिशा में आगे बढ़ाता है, और इसका अंतरराष्ट्रीय बाजार पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Comments
Post a Comment